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मीडिया पक्षपात

मीडिया पक्षपात से तात्पर्य पत्रकारों एवं समाचार उत्पादकों द्वारा तरह-तरह से किए जाने वाले पक्षपात से है। मीडिया पक्षपात रिपोर्ट की जाने वाली घटनाओं एवं कहानियों के चुनाव के रूप में हो सकता है या उसकी प्रस्तुति के रूप में भी हो सकता है।

1. परिचय
मीडिया-अध्ययन के विद्वानों की मान्यता है कि मास-मीडिया का अवधारणात्मक उद्गम प्रोपेगंडा है। सोलहवीं सदी में कैथॅलिक मत के जीसूट अनुयायियों ने प्रोटेस्टेंटों द्वारा की जाने वाली आलोचना के जवाब में लैटिन भाषा के शब्द ‘प्रोपेगंडा’ से निकलने वाले तात्पर्यों के आधापर धर्म-सुधार विरोधी विचारधारात्मक मुहिम चलाई थी। इसके पीछे समझ यह थी कि लोग तब तक कोई संदेश आत्मसात् नहीं करते जब तक वह उन्हें बार-बार न दिया जाए। अट्ठारहवीं सदी के युरोपीय ज्ञानोदय के बाद बनी परिस्थितियों में संदेश-रचना की प्रक्रिया में परिवर्तन हुआ, क्योंकि उसके बाद उत्तरोत्तर वोटरों, उपभोक्ताओं और दर्शकों की दिलचस्पियों का ध्यान रखना ज़रूरी होता चला गया। आधुनिक राज्य ने विदेशी आक्रमण की अपवादस्वरूप परिस्थितियों में थोपी गयी सेंसरशिप को छोड़ कर आम नागरिकों को शिक्षित-प्रशिक्षित करने की प्राथमिकता अपनायी। मीडिया की स्व-घोषित तटस्थता यहाँ राज्य के काम आयी। सरकारी मशीनरी के बजाय एक राष्ट्रीय सहमति बना कर मीडिया को राष्ट्और राज्य-निर्माण की परियोजना में लगा कर सरकारों और राष्ट्रीय अभिजनों ने बहुत बड़ी कामयाबी हासिल की।
चूँकि मास-मीडिया बहुत बड़े पैमाने पर प्रचार- सामग्री का उत्पादन मनोरंजन, समाचार, विश्लेषण, विज्ञापन और संवादपरक चर्चाओं के माध्यम से कर सकता है, इसलिए बीसवीं सदी में इसकी प्रोपेगंडा संबंधी क्षमताओं का दोहन करने के लिए कॉरपोरेट जगत, राष्ट्र-राज्य और राजनीतिक विचारधाराओं के पैरोकारों ने खुली और छिपी तरकीबें विकसित की हैं। मीडिया की तरफ़ से व्यावहारिकता की दलील दी जाती है कि सभी तथ्यों और घटनाओं की रपट प्रसारित नहीं की जा सकती, इसलिए उनमें से कुछ को चुनना और कुछ को छोड़ना ही पड़ता है। चयन और छँटाई की इस प्रक्रिया से ही पक्षपात का जन्म होता है और पूर्व-निर्धारित सहमति गढ़ने में मदद मिलती है। विज्ञापकों को ख़ुश करने के लिए, मीडिया-मालिकों के हितों को साधने के लिए, बहुसंख्यकों या अल्पसंख्यकों की कथित भावनाओं को ठेस न लगने देने के नाम पर और राष्ट्र-राज्य की प्रधान विचारधारा को पुष्ट करने के लिए चुनिंदा तथ्यों पर ज़ोर दिया जाता है। मीडिया-पक्षपात के धार्मिक, नस्ली, लैंगिक, आयुपरक, सेक्शुअल, जातिगत और जातीयतावादी आयामों को भी रेखांकित किया गया है।
सभी लोग जानते हैं कि मीडिया पक्षपात करता है, पर उसके इस रवैये को चिह्नित करना और उसकी विस्तृत आलोचना करना एक मुश्किल काम है। पक्षपात के आरोप के जवाब में मीडिया के पैरोकार अक्सर पूछते हैं कि क्या किसी घटना की रिपोॄटग करने गये संवाददाता द्वारा दोनों पक्षों द्वारा अपने-अपने हक में की गयी बातों को सिलसिलेवार पेश कर देना ही निष्पक्ष पत्रकारिता है? ये लोग कहते हैं कि ‘बैलेंस्ड’ रिपोॄटग का मतलब होता है रीढ़हीन और धारहीन पत्रकारिता। ज़ाहिर है कि यह तर्क तटस्थता को बेतुका मानते हुए ‘पक्षधरता’ और ‘प्रतिबद्धता’ को ‘पक्षपात’ नहीं मानता। अगर मीडिया अपनी पक्षधरता को छिपाने की कोशिश नहीं कर रहा है जैसे वैकल्पिक मीडिया, तो उसके एकतरफ़ापन को उसकी क्वालिटी के रूप में ग्रहण किया जा सकता है। लेकिन, अगर तटस्थता की आड़ में एक ख़ास तरह की सहमति गढ़ने की कोशिश की जा रही है तो उसका पता लगाने और फिर उसे ज़ाहिर करने के लिए विस्तृत अध्ययन की ज़रूरत पड़ती है।
2004 में किये गये एक अध्ययन के मुताबिक मीडिया-पक्षपात की टोह लेने के लिए बारह तरीके इस्तेमाल किये जा सकते हैं: पत्रकारों, मीडिया-अभिजनों और पत्रकारिता के छात्रों के राजनीतिक/सांस्कृतिक दृष्टिकोणों का सर्वेक्षण किया जा सकता है; पत्रकारों के पुराने पेशेवराना सम्पर्कों पर नज़र डाली जा सकती है; प्रमुख पत्रकारों की राजनीतिक आस्थाओं का उद्घाटन करने वाले उद्धरण जमा किये जा सकते हैं; कम्प्यूटर के ज़रिये की-वर्ड्स का इस्तेमाल करके मीडिया-सामग्री के साऔर श्रेणी का पता लगाया जा सकता है; न्यूज़ स्टोरीज़ द्वारा सुझायी गयी नीतियों का अध्ययन किया जा सकता है; किसी घटना के नकारात्मक/सकारात्मक कवरेज को रेखांकित किया जा सकता है; मीडिया के उन लोगों के कॅरियर पर निगाह फेंकी जा सकती है जिनके हाथ में निर्णयकारी अधिकार होते हैं; सूचना/मनोरंजन-सामग्री को प्रभावित करने वाले विज्ञापन- स्रोतों का अध्ययन किया जा सकता है; मीडिया पर सरकारी प्रोपेगंडे और जन-सम्पर्क उद्योग के असर पर ध्यान दिया जा सकता है, मीडिया द्वारा टीका-टिप्पणी के लिए चुने गये विशेषज्ञों और प्रवक्ताओं को उन हित-समूहों और विचारधारा-पैरोकारों के बरक्स रख कर देखा जा सकता है जिन्हें मीडिया नहीं चुनता; और कॉरपोरेशनों और वाणिज्य एसोसिएशनों द्वारा पत्रकारों को किये गये भाषण वग़ैरह देने के बदले किये गये भुगतानों पर निगाह डाली जा सकती है।
मीडिया की पक्षधरता का विश्लेषण करने के मामले में ग्लासगो मीडिया ग्रुप का अध्ययन काफ़ी चर्चित हुआ है जिसमें यह पता लगाने की कोशिश की गयी थी कि टीवी और अख़बार मज़दूर आंदोलन के ख़िलाफ़ किस तरह कॉरपोरेट हितों की सेवा करते हैं। इस अध्ययन पर भी पक्षधरता का आरोप लगाया गया है कि वह मीडिया द्वारा मज़दूरों के बारे में इस्तेमाल की गयी जिन अभिव्यक्तियों को अपमानजनक करार देता है, वह दरअसल मज़दूरों द्वारा वर्णित आत्मछवि से ही ली गयी हैं। मीडिया और प्रोपेगंडे के बीच स्पष्ट संबंध स्थापित करने वाला एक विख्यात अध्ययन नोम चोम्स्की के प्रयासों का परिणाम है जिसमें दिखाया गया है कि स्वतंत्र मीडिया की साख को ठेस पहुँचाने के लिए अमेरिका की कॉरपोरेट शक्तियाँ किस तरह ‘कम्युनिस्ट विरोधी विचारधारा’ के फ़िल्टरों का इस्तेमाल करती हैं। दूसरी तरफ़, विकसित देशों के मीडिया पर किये गये अध्ययनों से नतीजा निकला है कि वह आम तौपर अनुदारतावादी विचार के मुकाबले उदारतावादी विचारधारा का पक्ष लेता है। 1986 में मीडिया-अभिजनों पर हुए एक अध्ययन से यह हकीकत सामने आयी थी कि न्यूयॉर्क टाइम्स और वाशिंगटन पोस्ट जैसे बड़े अख़बारों और प्रसारण नेटवर्कों के न्यूज़रूमों में बायें बाज़ू के उदारतावादी रुझानों का बोलबाला रहता है। सामाजिक और राजनीतिक विवादों के बारे में पत्रकाऔर विश्लेषक आम तौर से जो रवैया अपनाते हैं उस पर उनके निजी विचारों की गहरी छाप होती है।

2. भारतीय मिडिया और पक्षपात
मीडिया-पक्षपात और भारतीय मीडिया का समीकरण पश्चिम जैसा नहीं रहा है। आज़ादी से पहले पूरा भारतीय मीडिया दो ध्रुवों में बँटा हुआ था। अंग्रेज़ी के सभी बड़े अख़बार खुल कर औपनिवेशिक शासन का समर्थन करते थे और भारतीय भाषाओं का मीडिया बिना किसी अपवाद के राष्ट्रीय आंदोलन के पक्ष में खड़ा हुआ था। इसे ‘पक्षपात’ और ‘पक्षधरता’ के बीच किये जा सकने वाले फ़र्क की मिसाल समझा जा सकता है। 1947 में पंद्रह अगस्त को सत्ता-हस्तांतरण होते ही अंग्रेज़ी मीडिया रातों-रात राष्ट्रीय मीडिया में बदल गया। इसके बाद कमोबेश अस्सी के दशक के अंत तक भारत के सामाजिक-राजनीतिक आधुनिकीकरण और वैकासिक अर्थशास्त्पर आधारित मिश्रित अर्थनीतियों के मॉडल का रास्ता साफ़ करने के लिए बनी राष्ट्रीय सहमति में मीडिया के सभी पहलुओं ने अपने-अपने तरह से योगदान किया। नब्बे के दशक में मंदिर, मण्डल और बाज़ार की उदीयमान ताकतों के इर्द-गिर्द भारतीय राजनीति और समाज में नये ध्रुवीकरण हुए जिन्होंने उस राष्ट्रीय सहमति को भंग कर दिया। मीडिया के विभिन्न हिस्से कभी पक्षधरता और कभी पक्षपात का रवैया अपनाते हुए समय-समय पर इन शक्तियों का समर्थन और विरोध करने लगे। आज स्थिति यह है कि भारतीय मीडिया लगभग बिना किसी अपवाद के आर्थिक सुधारों और भूमण्डलीकरण का पक्ष ले रहा है। मीडिया ने इसे नयी राष्ट्रीय सहमति के रूप में ग्रहण कर लिया है।

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