• सत्यवती (सिंहासन बत्तीसी)

    सोलहवीं पुतली सत्यवती ने जो कथा कही वह इस प्रकार है- राजा विक्रमादित्य के शासन काल में उज्जैन नगरी का यश चारों ओर फैला हुआ था। एक से बढ़कर एक विद्वान उनके दर...

  • रत्नमञ्जरी (सिंहासन बत्तीसी)

    यह सिंहासन बत्तीसी की पहली पुतली थी। उसने राजा विक्रम के जन्म तथा इस सिंहासन प्राप्ति की कथा सुनायी। आर्याव में एक राज्य था जिसका नाम था अम्बावती। वहाँ के रा...

  • कौमुदी (सिंहासन बत्तीसी)

    सातवीं पुतली कौमुदी ने जो कथा कही वह इस प्रकार है- एक दिन राजा विक्रमादित्य अपने शयन-कक्ष में सो रहे थे। अचानक उनकी नींद करुण-क्रन्दन सुनकर टूट गई। उन्होंने ...

  • कामकंदला (सिंहासन बत्तीसी)

    चौथी पुतली कामकंदला की कथा से भी विक्रमादित्य की दानवीरता तथा त्याग की भावना का पता चलता है। वह इस प्रकार है- एक दिन राजा विक्रमादित्य दरबार को सम्बोधित कर र...

चित्रलेखा (सिंहासन बत्तीसी)

यह सिंहासन बत्तीसी की दूसरी पुतली थी। उसके द्वारा सुनायी गई कथा इस प्रकार है।
एक दिन राजा विक्रमादित्य शिकार खेलते-खेलते एक ऊँचे पहाड़ पर आए। वहाँ उन्होंने देखा एक साधु तपस्या कर रहा है। साधु की तपस्या में विघ्न नहीं पड़े यह सोचकर वे उसे श्रद्धापूर्वक प्रणाम करके लौटने लगे। उनके मुड़ते ही साधु ने आवाज़ दी और उन्हें रुकने को कहा। विक्रमादित्य रुक गए और साधु ने उनसे प्रसन्न होकर उन्हें एक फल दिया। उसने कहा- "जो भी इस फल को खाएगा तेजस्वी और यशस्वी पुत्र प्राप्त करेगा।" फल प्राप्त कर जब वे लौट रहे थे, तो उनकी नज़र एक तेज़ी से दौड़ती महिला पर पड़ी। दौड़ते-दौड़ते एक कुँए के पास आई और छलांग लगाने को उद्यत हुई। विक्रम ने उसे थाम लिया और इस प्रकार आत्महत्या करने का कारण जानना चाहा। महिला ने बताया कि उसकी कई लड़कियाँ हैं पर पुत्र एक भी नहीं। चूँकि हर बार लड़की ही जनती है, इसलिए उसका पति उससे नाराज है और गाली-गलौज तथा मार-पीट करता है। वह इस दुर्दशा से तंग होकर आत्महत्या करने जा रही थी। राजा विक्रमादित्य ने साधु वाला फल उसे दे दिया तथा आश्वासन दिया कि अगर उसका पति फल खाएगा, तो इस बार उसे पुत्र ही होगा। कुछ दिन बीत गए।
एक दिन एक ब्राह्मण विक्रम के पास आया और उसने वही फल उसे भेट किया। विक्रम स्री की चरित्रहीनता से बहुत दुखी हुए। ब्राह्मण को विदा करने के बाद वे फल लेकर अपनी पत्नी के पास आए और उसे वह फल दे दिया। विक्रम की पत्नी भी चरित्रहीन थी और नगर के कोतवाल से प्रेम करती थी। उसने वह फल नगर कोतवाल को दिया ताकि उसके घर यशस्वी पुत्र जन्म ले। नगर कोतवाल एक वेश्या के प्रेम में पागल था और उसने वह फल उस वेश्या को दे दिया। वेश्या ने सोचा कि वेश्या का पुत्र लाख यशस्वी हो तो भी उसे सामाजिक प्रतिष्ठा नहीं प्राप्त हो सकती है। उसने काफी सोचने के बाद यह निष्कर्ष निकाला कि इस फल को खाने का असली अधिकारी राजा विक्रमादित्य ही है। उसका पुत्र उसी की तरह योग्य और सामध्र्यवान होगा तो प्रजा की देख-रेख अच्छी तरहा होगी और सभी खुश रहेगे। यही सोचकर उसने विक्रमादित्य को वह फल भेंट कर दिया। फल को देखकर विक्रमादित्य ठगे-से रह गए। उन्होंने पड़ताल कराई तो नगर कोतवाल और रानी के अवैध सम्बन्ध का पता चल गया। वे इतने दुखी और खिन्न हो गए कि राज्य को ज्यों का त्यों छोड़कर वन चले गए और कठिन तपस्या करने लगे।
चूँकि विक्रमादित्य देवताओं और मनुष्यों को समान रूप से प्रिय थे, देवराज इन्द्र ने उनकी अनुपस्थिति में राज्य की रक्षा के लिए एक शक्तिशाली देव भेज दिया। वह देव नृपविहीन राज्य की बड़ी मुस्तैदी से रक्षा तथा पहरेदारी करने लगा। कुछ दिनों के बाद विक्रमादित्य का मन अपनी प्रजा को देखने को करने लगा। जब उन्होंने अपने राज्य में प्रवेश करने की चेष्टा की तो देव सामने आ खड़ा हुआ। उसे अपनी वास्तविक पहचान देने के लिए विक्रम ने उससे युद्ध किया और पराजित किया। पराजित देव मान गया कि उसे हराने वाले विक्रमादित्य ही हैं और उसने उन्हें बताया कि उनका एक पिछले जन्म का शत्रु यहाँ आ पहुँचा है और सिद्धि कर रहा है। वह उन्हें खत्म करने का हर सम्भव प्रयास करेगा।
यदि विक्रम ने उसका वध कर दिया तो लम्बे समय तक वे निर्विघ्न राज्य करेंगे। योगी के बारे में सब कुछ बताकर उस देव ने राजा से अनुमति ली और चला गया। विक्रम की चरित्रहीन पत्नी तब तक ग्लानि से विष खाकर मर चुकी थी। विक्रम ने आकर अपना राजपाट सम्भाल लिया और राज्य का सभी काम सुचारुपूर्वक चलने लगा। कुछ दिनों के बाद उनके दरबार में वह योगी आ पहुँचा। उसने विक्रम को एक ऐसा फल दिया जिसे काटने पर एक कीमती लाल निकला। पारितोषिक के बदले उसने विक्रम से उनकी सहायता की कामना की। विक्रम सहर्ष तैयार हो गए और उसके साथ चल पड़े। वे दोनों श्मशान पहुँचे तो योगी ने बताया कि एक पेड़ पर बेताल लटक रहा है और एक सिद्धि के लिए उसे बेताल की आवश्यकता है। उसने विक्रम से अनुरोध किया कि वे बेताल को उताकर उसके पास ले आएँ।
विक्रम उस पेड़ से बेताल को उताकर कंधे पर लादकर लाने की कोशिश करने लगे। बेताल बार-बार उनकी असावधानी का फायदा उठा कर उड़ जाता और पेड़ पर लटक जाता। ऐसा चौबीस बार हुआ। हर बार बेताल रास्ते में विक्रम को एक कहानी सुनाता। पच्चीसवीं बार बेताल ने विक्रम को बताया कि जिस योगी ने उसे लाने भेजा है वह दुष्ट और धोखेबाज़ है। उसकी तांत्रिक सिद्धी की आज समाप्ति है तथा आज वह विक्रम की बलि दे देगा जब विक्रम देवी के सामने सर झुकाएगा। राजा की बलि से ही उसकी सिद्धि पूरी हो सकती है।
विक्रम को तुरन्त इन्द्र के देव की चेतावनी याद आई। उन्होंने बेताल को धन्यवाद दिया और उसे लादकर योगी के पास आए। योगी उसे देखकर अत्यन्त हर्षित हुआ और विक्रम से देवी के चरणों में सर झुकाने को कहा। विक्रम ने योगी को सर झुकाकर सर झुकाने की विधि बतलाने को कहा। ज्योंहि योगी ने अपना सर देवी चरणों में झुकाया कि विक्रम ने तलवार से उसकी गर्दन काट दी। देवी बलि पाकर प्रसन्न हुईं और उन्होंने विक्रम को दो बेताल सेवक दिए। उन्होंने कहा कि स्मरण करते ही ये दोनों बेताल विक्रम की सेवा में उपस्थित हो जाएँगे। विक्रम देवी का आशिष पाकर आनन्दपूर्वक वापस महल लौटे।

उपन य स - भगवत चरण वर म क ह न द उपन य स च त रल ख पत र क च त रल ख - ह न द फ ल म च त रल ख स ह सन बत त स - स ह सन बत त स कथ क द सर प तल
यह स ह सन बत त स क पहल प तल थ उसन र ज व क रम क जन म तथ इस स ह सन प र प त क कथ स न य आर य व म एक र ज य थ ज सक न म थ अम ब वत वह
स ह सन बत त स स स क त: स ह सन द व त र श क व क रमचर त एक ल ककथ स ग रह ह प रज वत सल, जनन यक, प रय गव द एव द रदर श मह र ज व क रम द त य भ रत य
ब द सचम च ब र ह मण दम पत त क प त र ल भ ह आ द व ब स ह सन बत त स रत नम जर च त रल ख चन द रकल क मक दल ल ल वत रव भ म क म द
ह सकर उस च र क च र रत न उपह र म द ए द व ब स ह सन बत त स रत नम जर च त रल ख चन द रकल क मक दल ल ल वत रव भ म क म द
ख दव य तथ उस स ह सन क उसम दबव द य वह ख द अम ब वत क नई र जध न बनव कर श सन करन लग द व ब स ह सन बत त स रत नम जर च त रल ख चन द रकल
क ण डल द द ए उन ह ब ल क ल मल ल नह ह आ द व ब स ह सन बत त स रत नम जर च त रल ख चन द रकल क मक दल ल ल वत रव भ म क म द
उन ह न अश व तथ रथ उस उपह र स वर प द द य द व ब स ह सन बत त स रत नम जर च त रल ख चन द रकल क मक दल ल ल वत रव भ म क म द
अपन सम पत त म न ग जनत जय - जयक र कर उठ द व ब स ह सन बत त स रत नम जर च त रल ख चन द रकल क मक दल ल ल वत रव भ म क म द
द य तथ कह क उनक क र क त त च र ओर फ ल ग द व ब स ह सन बत त स रत नम जर च त रल ख चन द रकल क मक दल ल ल वत रव भ म क म द

क वरद न द कर व सपर व र अन तध र य न ह गए द व ब स ह सन बत त स रत नम जर च त रल ख चन द रकल क मक दल ल ल वत रव भ म क म द
अगर क ई श सक ह त वह स ह सन अपन स र व श षत ओ और चमक क स थ ब हर आ ज एग द व ब स ह सन बत त स रत नम जर च त रल ख चन द रकल क मक दल
भ ग य प र तरह स त ष ट ह कर वह स चल गए द व ब स ह सन बत त स रत नम जर च त रल ख चन द रकल क मक दल ल ल वत रव भ म क म द
यह स ह सन बत त स क उन न सव प तल थ उसक द व र र ज भ ज क स न ई गई कथ इस प रक र ह र ज व क रम द त य क दरब र म ल ग अपन समस य ए ल कर न य य
तर क स बच ग तथ बड ब ल पन स परह ज कर ग द व ब स ह सन बत त स रत नम जर च त रल ख चन द रकल क मक दल ल ल वत रव भ म क म द
गई और द न क व व ह ध म - ध म स सम पन न ह आ द व ब स ह सन बत त स रत नम जर च त रल ख चन द रकल क मक दल ल ल वत रव भ म क म द
न मन ह मन उनक प रश स क तथ च प ह गय द व ब स ह सन बत त स रत नम जर च त रल ख चन द रकल क मक दल ल ल वत रव भ म क म द
ब र ह मण रत न और घ ड प कर फ ल नह सम य द व ब स ह सन बत त स रत नम जर च त रल ख चन द रकल क मक दल ल ल वत रव भ म क म द
द आए द त ह आ स त ष ट ह कर दरब र स व द ह आ द व ब स ह सन बत त स रत नम जर च त रल ख चन द रकल क मक दल ल ल वत रव भ म क म द
ल ए रख ल य च र ओर उनक जय - जयक र ह न लग द व ब स ह सन बत त स रत नम जर च त रल ख चन द रकल क मक दल ल ल वत रव भ म क म द

फल क र प म ह क स क र जगद द म लत ह द व ब स ह सन बत त स रत नम जर च त रल ख चन द रकल क मक दल ल ल वत रव भ म क म द
स थ कर द ज स तरह क स र जक म र क ह त ह द व ब स ह सन बत त स रत नम जर च त रल ख चन द रकल क मक दल ल ल वत रव भ म क म द
झट स व ष क श श न क ल और व षप न कर ल य द व ब स ह सन बत त स रत नम जर च त रल ख चन द रकल क मक दल ल ल वत रव भ म क म द
ह ए उन ह न उस एक ल ख स वर ण म द र ए द द व ब स ह सन बत त स रत नम जर च त रल ख चन द रकल क मक दल ल ल वत रव भ म क म द
द य और म ह न स ख द व ध वत व व ह कर ल य द व ब स ह सन बत त स रत नम जर च त रल ख चन द रकल क मक दल ल ल वत रव भ म क म द
ह ब झ झक द न कर ड ल ज स क ई त च छ च ज ह द व ब स ह सन बत त स रत नम जर च त रल ख चन द रकल क मक दल ल ल वत रव भ म क म द
म न ल य क उस य वक क म नन ब ल क ल सह ह द व ब स ह सन बत त स रत नम जर च त रल ख चन द रकल क मक दल ल ल वत रव भ म क म द
ह ग इतन कहकर इन द र अन तर ध र य न ह गए द व ब स ह सन बत त स रत नम जर च त रल ख चन द रकल क मक दल ल ल वत रव भ म क म द
स ज ग ह स र क आनन द क स म नह रह द व ब स ह सन बत त स रत नम जर च त रल ख चन द रकल क मक दल ल ल वत रव भ म क म द

ब त कर म क ट ल कर व क रम अपन र ज य व पस आ गए द व ब स ह सन बत त स रत नम जर च त रल ख चन द रकल क मक दल ल ल वत रव भ म क म द

अनुरोधवती (सिंहासन बत्तीसी)

अनुरोधवती नामक बाइसवीं पुतली ने जो कथा सुनाई वह इस प्रकार है- राजा विक्रमादित्य अद्भुत गुणग्राही थे। वे सच्चे कलाकारों का बहुत अधिक सम्मान करते थे तथा स्पष्ट...

करुणावती (सिंहासन बत्तीसी)

चौबीसवीं पुतली करुणावती ने जो कथा कही वह इस प्रकार है- राजा विक्रमादित्य का सारा समय ही अपनी प्रजा के दुखों का निवारण करने में बीतता था। प्रजा की किसी भी समस...

कामकंदला (सिंहासन बत्तीसी)

चौथी पुतली कामकंदला की कथा से भी विक्रमादित्य की दानवीरता तथा त्याग की भावना का पता चलता है। वह इस प्रकार है- एक दिन राजा विक्रमादित्य दरबार को सम्बोधित कर र...

कीर्तिमती (सिंहासन बत्तीसी)

तेरहवीं पुतली कीर्तिमती ने इस प्रकार कथा कही- एक बार राजा विक्रमादित्य ने एक महाभोज का आयोजन किया। उस भोज में असंख्य विद्धान, ब्राह्मण, व्यापारी तथा दरबारी आ...

कौमुदी (सिंहासन बत्तीसी)

सातवीं पुतली कौमुदी ने जो कथा कही वह इस प्रकार है- एक दिन राजा विक्रमादित्य अपने शयन-कक्ष में सो रहे थे। अचानक उनकी नींद करुण-क्रन्दन सुनकर टूट गई। उन्होंने ...

कौशल्या (सिंहासन बत्तीसी)

इकत्तीसवीं पुतली जिसका नाम कौशल्या था, ने अपनी कथा इस प्रकार कही- राजा विक्रमादित्य वृद्ध हो गए थे तथा अपने योगबल से उन्होंने यह भी जान लिया कि उनका अन्त अब ...

चन्द्रकला (सिंहासन बत्तीसी)

तीसरी पुतली चन्द्रकला ने जो कथा सुनाई वह इस प्रकार है- एक बार पुरुषार्थ और भाग्य में इस बात पर ठन गई कि कौन बड़ा है। पुरुषार्थ कहता कि बगैर मेहनत के कुछ भी स...

चन्द्रज्योति (सिंहासन बत्तीसी)

चन्द्रज्योति नामक इक्कीसवीं पुतली की कथा इस प्रकार है- एक बार विक्रमादित्य एक यज्ञ करने की तैयारी कर रहे थे। वे उस यज्ञ में चन्द्र देव को आमन्त्रित करना चाहत...

जयलक्ष्मी (सिंहासन बत्तीसी)

तीसवीं पुतली जयलक्ष्मी ने जो कथा कही वह इस प्रकार है- राजा विक्रमादित्य जितने बड़े राजा थे उतने ही बड़े तपस्वी। उन्होंने अपने तप से जान लिया कि वे अब अधिक से...

ज्ञानवती (सिंहासन बत्तीसी)

बीसवीं पुतली ज्ञानवती ने जो कथा सुनाई वह इस प्रकार है- राजा विक्रमादित्य सच्चे ज्ञान के बहुत बड़े पारखी थे तथा ज्ञानियों की बहुत कद्र करते थे। उन्होंने अपने ...

तारावती (सिंहासन बत्तीसी)

अठारहवीं पुतली तारामती की कथा इस प्रकार है- राजा विक्रमादित्य की गुणग्राहिता का कोई जवाब नहीं था। वे विद्वानों तथा कलाकारों को बहुत सम्मान देते थे। उनके दरबा...

त्रिनेत्री (सिंहासन बत्तीसी)

त्रिनेत्री नामक पच्चीसवीं पुतली की कथा इस प्रकार है- राजा विक्रमादित्य अपनी प्रजा के सुख दुख का पता लगाने के लिए कभी-कभी वेश बदलकर घूमा करते थे तथा खुद सारी ...

त्रिलोचना (सिंहासन बत्तीसी)

ग्यारहवीं पुतली त्रिलोचनी जो कथा कही वह इस प्रकार है- राजा विक्रमादित्य बहुत बड़े प्रजापालक थे। उन्हें हमेंशा अपनी प्रजा की सुख-समृद्धि की ही चिन्ता सताती रह...

धर्मवती (सिंहासन बत्तीसी)

तेइसवीं पुतली जिसका नाम धर्मवती था, ने इस प्रकार कथा कही- एक बार राजा विक्रमादित्य दरबार में बैठे थे और दरबारियों से बातचीत कर रहे थे। बातचीत के क्रम में दरब...

पद्मावती (सिंहासन बत्तीसी)

बारहवीं पुतली पद्मावती ने जो कथा सुनाई वह इस प्रकार है- एक दिन रात के समय राजा विक्रमादित्य महल की छत पर बैठे थे। मौसम बहुत सुहाना था। पूनम का चाँद अपने यौवन...

पुष्पवती (सिंहासन बत्तीसी)

आठवीं पुतली पुष्पवती की कथा इस प्रकार है- राजा विक्रमादित्य अद्भुत कला-पारखी थे। उन्हें श्रेष्ठ कलाकृतियों से अपने महल को सजाने का शौक था। वे कलाकृतियों का म...

प्रभावती (सिंहासन बत्तीसी)

दसवीं पुतली प्रभावती ने जो कथा सुनाई वह इस प्रकार है- एक बार राजा विक्रमादित्य शिकार खेलते-खेलते अपने सैनिकों की टोली से काफी आगे निकलकर जंगल में भटक गए। उन्...

मधुमालती (सिंहासन बत्तीसी)

नवीं पुतली मधुमालती ने जो कथा सुनाई उससे विक्रमादित्य की प्रजा के हित में प्राणोत्सर्ग करने की भावना झलकती है। कथा इस प्रकार है- एक बार राजा विक्रमादित्य ने ...

मलयवती (सिंहासन बत्तीसी)

मलयवती नाम की सताइसवीं पुतली ने जो कथा सुनाई वह इस प्रकार है- विक्रमादित्य बड़े यशस्वी और प्रतापी राजा था और राज-काज चलाने में उनका कोई मानी था। वीरता और विद...

मानवती (सिंहासन बत्तीसी)

उन्तीसवीं पुतली मानवती ने इस प्रकार कथा सुनाई- राजा विक्रमादित्य वेश बदलकर रात में घूमा करते थे। ऐसे ही एक दिन घूमते-घूमते नदी के किनारे पहुँच गए। चाँदनी रात...

मृगनयनी (सिंहासन बत्तीसी)

मृगनयनी नामक छब्बीसवीं पुतली ने जो कथा सुनाई वह इस प्रकार है- राजा विक्रमादित्य न सिर्फ अपना राजकाज पूरे मनोयोग से चलाते थे, बल्कि त्याग, दानवीरता, दया, वीरत...

रत्नमञ्जरी (सिंहासन बत्तीसी)

यह सिंहासन बत्तीसी की पहली पुतली थी। उसने राजा विक्रम के जन्म तथा इस सिंहासन प्राप्ति की कथा सुनायी। आर्याव में एक राज्य था जिसका नाम था अम्बावती। वहाँ के रा...

रविभामा (सिंहासन बत्तीसी)

छठी पुतली रविभामा ने जो कथा सुनाई वह इस प्रकार है- एक दिन विक्रमादित्य नदी के तट पर बने हुए अपने महल से प्राकृतिक सौन्दर्य को निहार रहे थे। बरसात का महीना था...

रानी रुपवती (सिंहासन बत्तीसी)

बत्तीसवीं पुतली रानी रुपवती ने राजा भोज को सिंहासन पर बैठने की कोई रुचि नहीं दिखाते देखा तो उसे अचरज हुआ। उसने जानना चाहा कि राजा भोज में आज पहले वाली व्यग्र...

रुपरेखा (सिंहासन बत्तीसी)

यह सिंहासन बत्तीसी की उन्नीसवीं पुतली थी। उसके द्वारा राजा भोज को सुनागई कथा इस प्रकार है। राजा विक्रमादित्य के दरबार में लोग अपनी समस्याएँ लेकर न्याय के लिए...

लीलावती (सिंहासन बत्तीसी)

पाँचवीं पुतली लीलावती ने भी राजा भोज को विक्रमादित्य के बारे में जो कुछ सुनाया उससे उनकी दानवीरता ही झलकती थी। कथा इस प्रकार थी- हमेशा की तरह एक दिन विक्रमाद...

विद्यावती (सिंहासन बत्तीसी)

विद्यावती नामक सत्रहवीं पुतली ने जो कथा कही वह इस प्रकार है- महाराजा विक्रमादित्य की प्रजा को कोई कमी नहीं थीं। सभी लोग संतुष्ट तथा प्रसन्न रहते थे। कभी कोई ...

वैदेही (सिंहासन बत्तीसी)

अट्ठाइसवीं पुतली का नाम वैदेही था और उसने अपनी कथा इस प्रकार कही- एक बार राजा विक्रमादित्य अपने शयन कक्ष में गहरी निद्रा में लीन थे। उन्होंने एक सपना देखा। ए...

सत्यवती (सिंहासन बत्तीसी)

सोलहवीं पुतली सत्यवती ने जो कथा कही वह इस प्रकार है- राजा विक्रमादित्य के शासन काल में उज्जैन नगरी का यश चारों ओर फैला हुआ था। एक से बढ़कर एक विद्वान उनके दर...

सुनयना (सिंहासन बत्तीसी)

चौदहवीं पुतली सुनयना ने जो कथा की वह इस प्रकार है- राजा विक्रमादित्य सारे नृपोचित गुणों के सागर थे। उन जैसा न्यायप्रिय, दानी और त्यागी और कोई न था। इन नृपोचि...

सुन्दरवती (सिंहासन बत्तीसी)

पन्द्रहवीं पुतली की कथा इस प्रकार है- राजा विक्रमादित्य के शासन काल में उज्जैन राज्य की समृद्धि आकाश छूने लगी थी। व्यापारियों का व्यापार अपने देश तक ही सीमित...