• पुनर्जन्म

    ईश्वर के अवतारों लिए अवतार देखें। पुनर्जन्म एक भारतीय मान्यता है जिसमें जीवात्मा के जन्म और मृत्यु के बाद पुनर्जन्म की मान्यता को स्थापित किया गया है। विश्व ...

  • न्यायसूत्र

    न्यायसूत्र, भारतीय दर्शन का प्राचीन ग्रन्थ है। इसके रचयिता अक्षपाद गौतम हैं। यह न्यायदर्शन का सबसे प्राचीन रचना है। इसकी रचना का समय दूसरी शताब्दी ईसापूर्व ह...

  • न्याय दर्शन

    न्याय दर्शन भारत के छः वैदिक दर्शनों में एक दर्शन है। इसके प्रवर्तक ऋषि अक्षपाद गौतम हैं जिनका न्यायसूत्र इस दर्शन का सबसे प्राचीन एवं प्रसिद्ध ग्रन्थ है। जि...

  • तृष्णा

    भारतीय दर्शन के सन्दर्भ में तृष्णा का अर्थ प्यास, इच्छा या आकांक्षा से है। तृष्णां,तृ मतलब तीन, इष्णा मतलब लालच,।तीन लालच, पहला धन का लालच, दुसरा पुत्र का ला...

  • ज्ञान (भारतीय)

    भारतीय धर्मों में ज्ञान का अर्थ इसके सामान्य अर्थ से कुछ भिन्न है। उदाहरण के लिए जब हम कहते हैं कि महात्मा बुद्ध को बड़ी तपस्या के बाद ज्ञान की प्राप्ति हुई ...

  • चित्त

    स्रौत विज्ञान मनोविज्ञान घ्राण विज्ञान काय विज्ञान चक्षु विज्ञान जिह्वा विज्ञान

  • गुण (भारतीय संस्कृति)

    गुण शब्द का कई अर्थों में व्यवहार होता है। सामान्य बोलचाल की भाषा में वस्तु की उत्कर्षाधायक विशेषता को गुण कहते हैं। प्रधान के विपरीत अर्थ में भी गुण शब्द का...

  • क्लेश

    योगदर्शन के अनुसार अविद्या, अस्मिता, राग, द्वेष एवं अभिनिवेश पाँच क्लेश हैं। । भाष्यकर व्यास ने इन्हें विपर्यय कहा है और इनके पाँच अन्य नाम बताए हैं- तम, मोह...

  • काम

    काम, जीवन के चार पुरुषार्थों में से एक है। प्रत्येक प्राणी के भीतर रागात्मक प्रवृत्ति की संज्ञा काम है। वैदिक दर्शन के अनुसार काम सृष्टि के पूर्व में जो एक अ...

  • एकेश्वरवाद

    एकेश्वरवाद वह सिद्धान्त है जो ईश्वर एक है अथवा एक ईश्वर है विचार को सर्वप्रमुख रूप में मान्यता देता है। एकेश्वरवादी एक ही ईश्वर में विश्वास करता है और केवल उ...

  • ईश्वर (भारतीय दर्शन)

    ईश्वर शब्द भारतीय दर्शन तथा अध्यात्म शास्त्रों में जगत् की सृष्टि, स्थिति और संहारकर्ता, जीवों को कर्मफलप्रदाता तथा दु:खमय जगत् से उनके उद्धारकर्ता के अर्थ म...

  • अहिंसा

    अहिंसा का सामान्य अर्थ है हिंसा न करना। इसका व्यापक अर्थ है - किसी भी प्राणी को तन, मन, कर्म, वचन और वाणी से कोई नुकसान पहुँचाना। मन में किसी का अहित न सोचना...

  • अर्थवाद

    अर्थवाद भारतीय पूर्वमीमांसा दर्शन का विशेष पारिभाषिक शब्द, जिसका अर्थ है प्रशंसा, स्तुति अथवा किसी कार्यात्मक उद्देश्य को सिद्ध कराने के लिए॰इधर उधर की बातें...

  • अभाव

    अभाव का सामान्य अर्थ है - किसी वस्तु का न होना। कुमारिल भट्ट के अनुसार अभावज्ञान प्रत्यक्ष से नहीं होता क्योंकि वहाँ विषयेंद्रियसंबंध नहीं है। अभाव के साथ लि...

  • अनुमान

    अनुमान, दर्शन और तर्कशास्त्र का पारिभाषिक शब्द है। भारतीय दर्शन में ज्ञानप्राप्ति के साधनों का नाम प्रमाण हैं। अनुमान भी एक प्रमाण हैं। चार्वाक दर्शन को छोड़...

  • अक्षपाद गौतम

    Ancient Nyayasutras first ten sutras in Sanskrit.jpg अक्षपाद, न्यायसूत्र के रचयिता आचार्य। प्रख्यात न्यायसूत्रों के निर्माता का नाम पद्मपुराण उत्तर खंड, अध्य...

भारतीय दर्शन

हिंदू धर्म में कर्म

कर्म हिंदू धर्म की वह अवधारणा है, जो एक प्रणाली के माध्यम से कार्य-कारण के सिद्धांत की व्याख्या करती है, जहां पिछले हितकर कार्यों का हितकर प्रभाव और हानिकर क...

अक्षपाद गौतम

Ancient Nyayasutras first ten sutras in Sanskrit.jpg अक्षपाद, न्यायसूत्र के रचयिता आचार्य। प्रख्यात न्यायसूत्रों के निर्माता का नाम पद्मपुराण उत्तर खंड, अध्य...

अज्ञान

अज्ञान - वस्तु के ज्ञान का अभाव। अज्ञान दो प्रकार का हो सकता है- एक वस्तु के ज्ञान का अत्यंत अभाव, जैसे सामने रखी वस्तु को न देखना; दूसरा वस्तु के वास्तविक स...

अज्ञान (सम्प्रदाय)

अज्ञान प्राचीन भारतीय दर्शन का एक दार्शनिक सम्प्रदाय था जो नास्तिक था। यह एक श्रमण आन्दोलन था जो प्रारम्भिक जैन धर्म और बौद्ध धर्म का प्रतिद्वन्द्वी था। इनका...

अदृष्ट

नैयायिकों के अनुसार कर्मों द्वारा उत्पन्न फल दो प्रकार का होता है। अच्छे कार्यों के करने से एक प्रकार की शोभन योग्यता उत्पन्न होती है जिसे पुण्य कहते हैं। बु...

अध्यारोपापवाद

अध्यारोपापवाद) अद्वैत वेदांत में आत्मतत्व के उपदेश की वैज्ञानिक विधि। ब्रह्म के यथार्थ रूप का उपदेश देना अद्वैमत के आचार्य का प्रधान लक्ष्य है। ब्रह्म है स्व...

अनुपलब्धि

भारतीय दर्शन के सन्दर्भ में, अनुपलब्धि या अभावप्रमाण एक प्रमाण है। इसे पूर्वमीमांसा में कुमारिल भट्ट सम्प्र्दाय ने एक प्रमाण माना है। पूर्वमीमांसा ने इसके अत...

अनुमान

अनुमान, दर्शन और तर्कशास्त्र का पारिभाषिक शब्द है। भारतीय दर्शन में ज्ञानप्राप्ति के साधनों का नाम प्रमाण हैं। अनुमान भी एक प्रमाण हैं। चार्वाक दर्शन को छोड़...

अनेकान्तिक हेतु

अनेकांतिक हेतु, हेत्वाभास का एक भेद है जिसे सव्यभिचार भी कहते हैं। अनुमान में हेतु को साध्य की अपेक्षा कम स्थानों पर किंतु साध्य के साथ रहना चाहिए। यदि हेतु ...

अन्यथानुपपत्ति

अन्यथानुपपत्ति का अर्थ है - किसी अत्यायश्यक कारण के बिना। किसी तथ्य के अनेक कारण होते हैं किंतु उनमें से कोई एक कारण सर्वप्रधान होता है। अन्य कारणों के रहते ...

अप्रमा

प्रमा से विपरीत अनुभव को अप्रमा कहते हैं अर्थात्‌ किसी वस्तु में किसी गुण का अनुभव जिसमें वह गुण विद्यमान ही नहीं रहता। न्यायमत में ज्ञान दो प्रकार का होता ह...

अभाव

अभाव का सामान्य अर्थ है - किसी वस्तु का न होना। कुमारिल भट्ट के अनुसार अभावज्ञान प्रत्यक्ष से नहीं होता क्योंकि वहाँ विषयेंद्रियसंबंध नहीं है। अभाव के साथ लि...

अर्थ

अर थ म बन ह न द भ ष क फ ल म ह आम र ख न - द ल नव ज नन द त द स - श त र ह ल खन न - हसन रघ व र य दव - हर य ह म मत अल क ट ग डव न - ब ट ग गल अर थ व स तव क भ म डल v...

अर्थवाद

अर्थवाद भारतीय पूर्वमीमांसा दर्शन का विशेष पारिभाषिक शब्द, जिसका अर्थ है प्रशंसा, स्तुति अथवा किसी कार्यात्मक उद्देश्य को सिद्ध कराने के लिए॰इधर उधर की बातें...

अर्थसंग्रह

अर्थसंग्रह मीमांसा का एक लघुकाय प्रकरण ग्रन्थ है, जिसमें शाबरभाष्य में प्रतिपादित बहुत से विषयों का अतिसंक्षेप में निरूपण है। संक्षेप में अधिकतम विषयों को प्...

अर्थापत्ति

मीमांसा दर्शन में अर्थापत्ति एक प्रमाण माना गया है। यदि कोई व्यक्ति जीवित है किंतु घर में नहीं है तो अर्थापत्ति के द्वारा ही यह ज्ञात होता है कि वह बाहर है। ...

अलातशांति

लकड़ी आदि को प्रज्वलित कर चक्राकार घुमाने पर अग्नि के चक्र का भ्रम होता है। यदि लकड़ी की गति को रोक दिया जाए तो चक्राकार अग्नि का अपने आप नाश हो जाता है। बौद...

अविद्या

अविद्या, विद्या का विलोम शब्द है। भारतीय धर्मों में अविद्या का अर्थ है- अज्ञान, गलत धारणा। हिन्दू ग्रन्थों में अविद्या का बार-बार प्रयोग हुआ है। ब्रह्म ज्ञान...

अव्यक्त

अव्यक्त शब्द का प्रयोग प्रकृति तथा ब्रह्म के लिये किया जाता है। ॐ:- अव्यक्त अर्थात्‌ जो व्यक्त नहिं है अव्यक्त प्रकृति, पुरुष, ब्रह्म के लिय प्रयोग होता है व...

असत्‌कार्यवाद

असत्‌कार्यवाद कारणवाद का न्यायदर्शनसम्मत सिद्धांत जिसके अनुसार कार्य उत्पत्ति के पहले नहीं रहता। न्याय के अनुसार उपादान और निमित्त कारण अलग-अलग कार्य उत्पन्न...

अहिंसा

अहिंसा का सामान्य अर्थ है हिंसा न करना। इसका व्यापक अर्थ है - किसी भी प्राणी को तन, मन, कर्म, वचन और वाणी से कोई नुकसान पहुँचाना। मन में किसी का अहित न सोचना...

आत्मज्ञान

आत्मज्ञामन के भीतर की जागरूपता है। भारतीय दर्शन में इसका प्रतीक शिव, विष्णु अथवा शक्ति हैं। इसका वर्णन बहुत वेद और उपनिषद में मिलता है। वैदिक परम्परा के अनुस...

आत्मबोध

आत्मबोध का शाब्दिक अर्थ है, स्वयं को जानना। प्राचीन भारत की शिक्षा में इसका बहुत बड़ा प्रभाव था। आत्मबोध, आदि शंकराचार्य द्वारा रचित एक लघु ग्रन्थ का नाम भी ...

आभासवाद

आभासवाद त्रिक दर्शन की दार्शनिक दृष्टि का अभिधान है। कश्मीर का त्रिक दर्शन अद्वैतवादी है। इसके अनुसार परमशिव जो "अनुत्तर", "संविद्" आदि अनेक नामों से प्रख्या...

आरम्भवाद

आरंभवाद - कार्य संबंधी न्यायशास्त्र का सिद्धांत। कारणों से कार्य की उत्पत्ति होती है। उत्पत्ति के पहले कार्य नहीं होता। यदि कार्य उत्पत्ति के पहले रहता तो उत...

ईश्वर (भारतीय दर्शन)

ईश्वर शब्द भारतीय दर्शन तथा अध्यात्म शास्त्रों में जगत् की सृष्टि, स्थिति और संहारकर्ता, जीवों को कर्मफलप्रदाता तथा दु:खमय जगत् से उनके उद्धारकर्ता के अर्थ म...

ईश्वरकृष्ण

ईश्वरकृष्ण एक प्रसिद्ध सांख्य दर्शनकार थे। इनका काल विवादग्रस्त है। डॉ॰ तकाकुसू के अनुसार उनका समय ४५० ई. के लगभग और डॉ॰ वि. स्मिथ के अनुसार २४० ई. के आसपास ...

उच्छेदवाद

उच्छेदवाद आत्मा के भी नष्ट हो जाने का सिद्धांत है। प्राचीन काल में अजित केशकंबली के सिद्धांत को उच्छेदवाद के नाम से जाना जाता था। इस सिद्धांत के अनुसार मृत्य...

उत्तरमीमांसा

उत्तरमीमांसा छः भारतीय दर्शनों में से एक। उत्तरमीमांसा को शारीरिक मीमांसा और वेदान्त दर्शन भी कहते हैं। ये नाम बादरायण के बनाए हुए ब्रह्मसूत्र नामक ग्रन्थ के...

उपजीव्य-उपजीवक

किसी वस्तु की उपपत्ति के लिए जो अपेक्षणीय है, वह उपजीव्य है तथा जो अपेक्षा करे वह उपजीवक है। अर्थात् जिस पर निर्भर रहा जाए वह उपजीव्य है और जो निर्भर रहे वह ...

उपादान

किसी वस्तु की तृष्णा से उसे ग्रहण करने की जो प्रवृत्ति होती है, उसे उपादान कहते हैं। प्रतीत्यसमुत्पादन की दूसरी कड़ी तण्हापच्चया उपादानं - इसी का प्रतिपादान ...

उपाधि

न्यायशास्त्र के पारिभाषिक शब्द अन्वय और व्यतिरेक के आधापर साथ रहनेवाली वस्तुओं में एक को हेतु और दूसरे को साध्य माना जाता है। कभी-कभी अन्वय-व्यतिरेक में दोष ...

ऊर्जा चिकित्सा

ब्रह्मांड के सकारात्मक चिकित्सकीय ऊर्जा किरणों को साधना/एकाग्रता के द्वारा प्राप्त करना और उसका अपने जरूरत के अनुसार उपयोग करना ही ऊर्जा चिकित्सा का सीधा और ...

एकजीववाद

एकजीववाद सिद्धांत के अनुसार वेदांत में एक ही जीव की स्थिति मानी जाती है। अविद्या एक है, अत: अविद्या से आवृत्त जीव भी एक होगा। इस वाद के कई रूप शंकर के परवर्त...

एकेश्वरवाद

एकेश्वरवाद वह सिद्धान्त है जो ईश्वर एक है अथवा एक ईश्वर है विचार को सर्वप्रमुख रूप में मान्यता देता है। एकेश्वरवादी एक ही ईश्वर में विश्वास करता है और केवल उ...

कणाद

कणाद एक ऋषि थे। स्वतंत्र भौतिक विज्ञानवादी दर्शन प्रकार के आत्मदर्शन के विचारों का सबसे पहले महर्षि कणाद ने सूत्र रूप में लिखा। ये "उच्छवृत्ति" थे और धान्य क...

कषाय

भारतीय दर्शन में कषाय शब्द का प्रयोग विशेष रूप से राग, द्वेष आदि दोषों के लिए हुआ है। छांदोग्य उपनिषद के अनुसार मृदित कषाय जिनका कषाय नष्ट हो गया है नारद को ...

काम

काम, जीवन के चार पुरुषार्थों में से एक है। प्रत्येक प्राणी के भीतर रागात्मक प्रवृत्ति की संज्ञा काम है। वैदिक दर्शन के अनुसार काम सृष्टि के पूर्व में जो एक अ...

कारण तथा कार्य (अद्वैत वेदान्त)

ह त ह व स ह क रण क जगह क र य द ख ई पड त ह अत: क रणक र य क भ द त त व क भ द नह ह यह भ द औपच र क ह इस मत क ज अद व त व द न त म स व क त ह और रमण महर ष उल ल खन य ह...

कूटस्थ

कूटस्थ, भारतीय दर्शन में आत्मा, पुरुष, ब्रह्म तथा ईश्वर के लिए प्रयुक्त शब्द। यह परम सत्ता के स्वरूप को व्यक्त करता है। कूटस्थ का अर्थ है कूट का अधिष्ठान अथव...

केवलान्वयी

केवलान्वयी, न्यायदर्शन में एक प्रकार का विशेष अनुमान है। यहाँ हेतु, साध्य के साथ सर्वदा सत्तात्मक रूप से ही संबद्ध रहता है। न्यायदर्शन के अनुसार व्याप्ति दो ...

क्लेश

योगदर्शन के अनुसार अविद्या, अस्मिता, राग, द्वेष एवं अभिनिवेश पाँच क्लेश हैं। । भाष्यकर व्यास ने इन्हें विपर्यय कहा है और इनके पाँच अन्य नाम बताए हैं- तम, मोह...

गुण (भारतीय संस्कृति)

गुण शब्द का कई अर्थों में व्यवहार होता है। सामान्य बोलचाल की भाषा में वस्तु की उत्कर्षाधायक विशेषता को गुण कहते हैं। प्रधान के विपरीत अर्थ में भी गुण शब्द का...

चतुष्कोटि

चतुष्कोटि एक तार्किक कथन है जिसमें चार विविक्त फलन होते हैं। इसका अनेकों कार्यों के लिये उपयोग किया गया है। भारतीय तर्कशास्त्र की परम्परा में यह बहुत महत्वपू...

चित्त

स्रौत विज्ञान मनोविज्ञान घ्राण विज्ञान काय विज्ञान चक्षु विज्ञान जिह्वा विज्ञान

जीवात्मा

वर ग करण क अन स र ज व त म क एक अलग अस त त व ह इस प रक र एक आत म द सर आत म स भ न न ह त ह इसक अर थ आत म अन क ह ज व त म परम त म एव प रक त व षय म ईश वर क सत त और...

ज्ञान (भारतीय)

भारतीय धर्मों में ज्ञान का अर्थ इसके सामान्य अर्थ से कुछ भिन्न है। उदाहरण के लिए जब हम कहते हैं कि महात्मा बुद्ध को बड़ी तपस्या के बाद ज्ञान की प्राप्ति हुई ...

तमस्

सांख्य दर्शन में, प्रकृति के तीन गुण बतागए हैं - सत्, रजस् और तमस्। तमस् गुण के प्रधान होने पर व्यक्ति को सत्य-असत्य का कुछ पता नहीं चलता, यानि वो अज्ञान के ...

तर्कसंग्रह

तर्कसंग्रह न्याय एवं वैशेषिक दोनो दर्शनों को समाहित करने वाला ग्रंथ है। इसके रचयिता अन्नंभट्ट हैं। इसके अध्ययन से न्याय एवं वैशेषिक के सभी मूल सिद्धान्तों का...

तृष्णा

भारतीय दर्शन के सन्दर्भ में तृष्णा का अर्थ प्यास, इच्छा या आकांक्षा से है। तृष्णां,तृ मतलब तीन, इष्णा मतलब लालच,।तीन लालच, पहला धन का लालच, दुसरा पुत्र का ला...

द्वैताद्वैत

द्वैताद्वैत दर्शन के प्रणेता निम्बार्क हैं। उनके दर्शन को भेदाभेदवाद भी कहते हैं। ईश्वर, जीव जगत् के मध्य भेदाभेद सिद्ध करते हुए द्वैत व अद्वैत दोनों की समान...

ध्यान (बौद्ध धर्म)

ब द ध धर म भ रत क श रमण परम पर स न कल ह आ एक धर म और मह न दर शन ह ईस प र व 6ठ शत ब द म ग तम ब द ध द व र ब द ध धर म क स थ पन ह ई ह एव त र प टक म ख य आठ प रक र...

न्याय (जैन)

भारतीय न्यायशास्त्र में जैन न्याय अवैदिक न्याय की श्रेणी में आता है। जैन न्याय की दो धाराएँ प्रसिद्ध हैं - श्वेताँबर और दिगंबर। दोनों का प्रमुख सिद्धांत है "...

न्याय (बौद्ध)

बौद्धन्याय, अवैदिक भारतीय न्याय की श्रेणी में आता है। बौद्धन्याय चार संप्रदायों में विभक्त है- वैभाषिक, सौत्रांतिक, योगाचाऔर माध्यमिक। इनमें प्रथम दो हीनयान ...

न्याय दर्शन

न्याय दर्शन भारत के छः वैदिक दर्शनों में एक दर्शन है। इसके प्रवर्तक ऋषि अक्षपाद गौतम हैं जिनका न्यायसूत्र इस दर्शन का सबसे प्राचीन एवं प्रसिद्ध ग्रन्थ है। जि...

न्यायशास्त्र (भारतीय)

कृपया भ्रमित न हों, यह लेख न्यायशास्त्र के बारे में नहीं है। वह शास्त्र जिसमें किसी वस्तु के यथार्थ ज्ञान के लिये विचारों की उचित योजना का निरुपण होता है, न्...

न्यायसूत्र

न्यायसूत्र, भारतीय दर्शन का प्राचीन ग्रन्थ है। इसके रचयिता अक्षपाद गौतम हैं। यह न्यायदर्शन का सबसे प्राचीन रचना है। इसकी रचना का समय दूसरी शताब्दी ईसापूर्व ह...

पञ्चभूत

पञ्चभूत भारतीय दर्शन में सभी पदार्थों के मूल माने गए हैं। आकाश, वायु, अग्नि, जल तथा पृथ्वी - ये पंचमहाभूत माने गए हैं जिनसे सृष्टि का प्रत्येक पदार्थ बना है।...

पदार्थ (भारतीय दर्शन)

मनुष्य सर्वदा से ही विभिन्न प्रकार की प्राकृतिक वस्तुओं द्वारा चारों तरफ से घिरा हुआ है। सृष्टि के आविर्भाव से ही वह स्वयं की अन्त:प्रेरणा से परिवर्तनों का अ...

परब्रह्म

"परब्रह्म" का शाब्दिक अर्थ है सर्वोच्च ब्रह्म - वह ब्रह्म जो सभी वर्णनों और संकल्पनाओं से भी परे है। अद्वैत वेदान्त का निर्गुण ब्रह्म भी परब्रह्म है। वैष्णव ...

पाणिनीय दर्शन

सर्वदर्शनसंग्रह में पाणिनीय व्याकरण दर्शन को भी भारत के प्राचीन दर्शनों में स्थान दिया है। सर्वदर्शनसंग्रह के रचयिता के मत से व्याकरण शास्त्र अर्थात पाणिनीयद...

पाशुपत दर्शन

पाशुपत दर्शन का उल्लेख सर्वदर्शनसंग्रह में है। इसे नकुलीश पाशुपति दर्शन भी कहते हैं। इस दर्शन में जीव मात्र को पशु की संज्ञा दी गई है। सब जीवों के अधीश्वर पश...

पुद्गल

जैन दर्शन के अनुसार स्थूल भौतिक पदार्थ पुद्गल कहलाता है क्योंकि यह अणुओं के संयोग और वियोग का खेल है। बौद्ध धर्मदर्शन में आत्मा को पुद्गल कहते हैं। यह पाँच स...

पुनर्जन्म

ईश्वर के अवतारों लिए अवतार देखें। पुनर्जन्म एक भारतीय मान्यता है जिसमें जीवात्मा के जन्म और मृत्यु के बाद पुनर्जन्म की मान्यता को स्थापित किया गया है। विश्व ...