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शैक्षिक प्रबंध

राज्य और शिक्षा का सम्बन्ध
राज्य और शिक्षा के बीच गहरा सम्बन्ध होता है।इस सम्बन्ध के अनके कारण है। अग्रलिखित पंक्तिओं में हम इन प्रमुख कारणों पर प्रकाश डाल रहे हैं –
1. शासन को सुचारू रूप से संचालित करने के लिए – प्रत्येक राज्य को न्याय, कानून की व्यवस्था, औधोगिक प्रगति, व्यवसायिक विकास, स्वास्थ्य तथा मनोरंजन आदि सभी क्षेत्रों में विभिन्न योग्यताओं के कर्मचारियों की आवशयकता पड़ती है।इन विभिन्न क्षेत्रों में करने वाले योग्य कर्मचारियों का निर्माण केवल शिक्षा के द्वारा हो सकता है।वर्तमान युग में जो राज्य अपनी जनता को जितनी अधिक शैक्षिक सुविधायें दे रहा है, वह विभिन्न क्षेत्रों में उतना ही अधिक विकसित हो रहा है।
2. संस्कृति तथा सभ्यता की रक्षा – प्रत्येक राज्य की अलग-अलग संस्कृति तथा सभ्यता होती है।इस संस्कृति एवं सभ्यता से राज्य की जनता को अगाध प्रेम होता है।इस प्रेम के वशीभूत होकर समस्त जनता एकता के सूत्र में बंधी रहती है।प्रत्येक राज्य इस एकता को बनाये रखने के लिए अपनी संस्कृति और सभ्यता की रक्षा करना चाहता है, जो केवल शिक्षा के ही द्वारा सम्भव है।
3. जनहित- प्रत्येक राज्य अपनी सरकार द्वारा जनता से कर वसूल करता है।इसको वह जनता के ही हित में खर्च करना चाहता है।जनता के हित का तात्पर्य है जनता के रहन-सहन तथा संस्कृति एवं सभ्यता को ऊँचे स्तर तक उठाना।इस कार्य को केवल शिक्षा के ही द्वारा पूरा किया जा सकता है।इसलिए प्रत्येक राज्य अपनी जनता को अधिक से अधिक जागरूक करने के लिए प्राप्त किये हुए कर की निश्चित धनराशी को शिक्षा की उचित व्यवस्था के करने में अवश्य व्यय करता है।
4. योग्य नागरिकों का निर्माण – प्रत्येक राज्य की प्रगति ऐसे नागरिकों पर निर्भर करती है जो प्रतेक समस्या को स्वतंत्र रूप से चिन्तन करके आसानी से सुलझा सकें।ऐसे सुयोग्य, सचरित्र तथा सुनिश्चित नागरिकों का निर्माण केवल शिक्षा के ही द्वारा किया जा सकता है।इस दृष्टि से प्रत्येक राज्य शिक्षा की अच्छी से अच्छी व्यवस्था करना अपना परम कर्त्तव्य समझता है।
5. अपनी स्वयं की प्रगति के लिए – प्रत्येक राज्य अन्य राज्यों से अधिक प्रगति करना चाहता है।परन्तु राज्य की प्रगति उसके नागरिकों पर निर्भर करती है।जिस राज्य के नागरिक जितने आधिक शिक्षित होंगे वह राज्य विभिन्न क्षत्रों में उतना ही अधिक प्रगतिशील होता चला जायेगा।इस दृष्टि से प्रत्येक राज्य अपने नागरिकों को अधिक से अधिक शिक्षित करने के लिए अच्छी से अच्छी शिक्षा की व्यवस्था करता है।जैसे –जैसे नागरिक शिक्षित होते जाते हैं, वैसे-वैसे राज्य भी प्रगतिशील होता चला जाता है
6. जनता में विचारधारा का प्रसार – प्रत्येक राज्य में राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक एवं धार्मिक विचारधारायें अलग-अलग होती है।राज्य इन विचारधाराओं को जनता तक पहुंचना चाहता है।केवल शिक्षा ही ऐसा साधन है जिसके द्वारा कोई भी राज्य अपने विचारों को अपनी जनता तक पहुंचा सकता है।अत: प्रत्येक राज्य का शिक्षा से घनिष्ट सम्बन्ध होता है।
शिक्षा में राज्य के हस्तक्षेप का क्रमिक विकास
समाज की उन्नति के लिए शिक्षा परमावश्यक है।इसीलिए प्रत्येक समाज में शिक्षा की व्यवस्था करना प्राचीन युग से ही एक महत्वपूर्ण कार्य समझा गया है।शिक्षा के कार्य को निम्नलिखित साधनों में से किसी एक अथवा सभी के द्वारा संचालित किया जा सकता है –
1. स्वलाभ के लिए।
2. दान तथा धार्मिक संस्थाओं द्वारा।
3. राज्य द्वारा।
प्राचीन युग में मानव ने शिक्षा की व्यवस्था अपने लाभ के लिए अपनी इच्छा से की थी। उस समय राज्य की शिक्षा से कोई सम्बन्ध नहीं था। मध्य युग में शिक्षा व्यवस्था दान तथा धार्मिक संस्थाओं के द्वारा हुई। इतिहास के अध्ययन से पता चलता है कि प्रत्येक धार्मिक संस्था ने शिक्षा के क्षेत्र में राज्य के हस्तक्षेप का डटकर विरोध किया। परन्तु जैसे-जैसे मानव में विवेक बढ़ता गया, वैसे-वैसे वह शिक्षा में राज्य ने शिक्षा के कार्य में सत्रहवीं शताब्दी में हस्तक्षेप करना आरम्भ कर दिया।शैने-शैने: उन्निसवीं शताब्दी तक शिक्षा पर पूर्ण नियंत्रण हो गया।
ध्यान देने की बात है की जहाँ एक ओर भारत में राज्य का शिक्षा से कोई सम्बन्ध नहीं था अथवा एथेन्स की सरकार ने भी हस्तक्षेप न करने की नीति अपनाई थी,वहीं दूसरी ओर स्पार्टा की शिक्षा पर राज्य का पूर्ण अधिकार था। मध्य युग में शिक्षा धार्मिक संस्थाओं के अधीन ही रही,परन्तु आगे चलकर जर्मनी के फिस्टे तथा हीगल आदि शिक्षा-शास्त्रीयों ने इस बात पर बल दिया कि शिक्षा पर राज्य का पूर्ण अधिकार होना चाहिये।इन विद्वानों की विचारधारा से प्रभावित होते हुए जर्मनी में शिक्षा केन्द्रीयकरण चरम सीमा तक पहुँच गया।इस प्रकार समय के साथ-साथ होने वाले परिवर्तनों तथा जनता की बढ़ती मांगों ने यह शिद्ध कर दिया कि जनसाधारण को शिक्षित करने का कार्य सिवाय राज्य के और कोई व्यक्तिगत, सार्वजनिक तथा धार्मिक संस्था नहीं कर सकती।इसलिए वर्तमान युग में अब राज्य से यह आशा की जाती है कि वह सुरक्षा, भोजन तथा निवास स्थान के साथ-साथ जनसाधारण की शिक्षा का भी उचित प्रबन्ध करे।
जिला स्तर
सर्व शिक्षा अभियान
सभी व्यक्ति को अपने जीवन की बेहतरी का अधिकार है। लेकिन दुनियाभर के बहुत सारे बच्चे इस अवसर के अभाव में ही जी रहे हैं क्योंकि उन्हें प्राथमिक शिक्षा जैसे अनिवार्य मूलभूत अधिकार भी मुहैया नहीं कराई जा रही है।
भारत में बच्चों को साक्षर करने की दिशा में चलाये जा रहे कार्यक्रमों के परिणामस्वरूप वर्ष 2000 के अन्त तक भारत में 94 प्रतिशत ग्रामीण बच्चों को उनके आवास से 1 किमी की दूरी पर प्राथमिक विद्यालय एवं 3 किमी की दूरी पर उच्च प्राथमिक विद्यालय की सुविधाएँ उपलब्ध थीं। अनुसूचित जाति व जनजाति वर्गों के बच्चों तथा बालिकाओं का अधिक से अधिक संख्या में स्कूलों में नामांकन कराने के उद्देश्य से विशेष प्रयास किये गये। प्रथम पंचवर्षीय योजना से लेकर अब तक प्राथमिक व उच्च प्राथमिक विद्यालयों में नामांकन लेने वाले बच्चों की संख्या एवं स्कूलों की संख्या मे निरंतर वृद्धि हुई है। 1950-51 में जहाँ प्राथमिक शिक्षा प्राप्त करने के लिए 3.1 मिलियन बच्चों ने नामांकन लिया था वहीं 1997-98 में इसकी संख्या बढ़कर 39.5 मिलियन हो गई। उसी प्रकार 1950-51 में प्राथमिक व उच्च प्राथमिक विद्यालयों की संख्या 0.223 मिलियन थी जिसकी संख्या 1996-97 में बढ़कर 0.775 मिलियन हो गई। एक अनुमान के मुताबिक वर्ष 2002-03 में 6-14 आयु वर्ग के 82 प्रतिशत बच्चों ने विभिन्न विद्यालयों में नामांकन लिया था। भारत सरकार का लक्ष्य इस संख्या को इस दशक के अंत तक 100 प्रतिशत तक पहुँचाना है।
जैसा कि हम सभी जानते हैं कि विश्व से स्थायी रूप से गरीबी को दूर करने और शांति एवं सुरक्षा का मार्ग प्रशस्त करने के लिए जरूरी है कि दुनिया के सभी देशों के नागरिकों एवं उसके परिवारों को अपनी पसंद के जीवन जीने का विकल्प चुनने में सक्षम बनाया जाए। इस लक्ष्य को पाना तभी संभव है जब दुनियाभर के बच्चों को कम से कम प्राथमिक विद्यालय के माध्यम से उच्च स्तरीय स्कूली सुविधाएँ उपलब्ध कराई जाएँ।
सर्व शिक्षा अभियान क्या है
सार्वभौमिक प्रारंभिक शिक्षा के लिए एक स्पष्ट समय-सीमा के साथ कार्यक्रम।
पूरे देश के लिए गुणवत्तायुक्त आधारभूत शिक्षा की माँग का जवाब,
आधारभूत शिक्षा के माध्यम से सामाजिक न्याय को बढ़ावा देने का अवसर,
प्रारंभिक शिक्षा के प्रबंधन में - पंचायती राज संस्थाओं, स्कूल प्रबंधन समिति, ग्रामीण व शहरी गंदी बस्ती स्तरीय शिक्षा समिति, अभिभावक-शिक्षक संगठन, माता-शिक्षक संगठन, जनजातीय स्वायतशासी परिषद् और अन्य जमीन से जुड़े संस्थाओं को, प्रभावी रूप से शामिल करने का प्रयास,
पूरे देश में सार्वभौमिक प्राथमिक शिक्षा के लिए राजनीतिक इच्छा-शक्ति की अभिव्यक्ति,
केन्द्र, राज्य एवं स्थानीय सरकार के बीच सहभागिता व
राज्यों के लिए प्रारंभिक शिक्षा का अपना दृष्टि विकसित करने का सुनहरा अवसर।
लक्ष्य कथन
सर्व शिक्षा अभियान, एक निश्चित समयावधि के भीतर प्रारंभिक शिक्षा के सार्वभौमीकरण लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए भारत सरकार का एक महत्वपूर्ण कार्यक्रम है। 86 वें संविधान संशोधन द्वारा 6-14 आयु वर्ष वाले बच्चों के लिए, प्राथमिक शिक्षा को एक मौलिक अधिकार के रूप में, निःशुल्क और अनिवार्य रूप से उपलब्ध कराना अनिवार्य बना दिया गया है। सर्व शिक्षा अभियान पूरे देश में राज्य सरकार की सहभागिता से चलाया जा रहा है ताकि देश के 11 लाख गाँवों के 19.2 लाख बच्चों की जरूरतों को पूरा किया जा सके। इस कार्यक्रम के अंतर्गत वैसे गाँवों में, जहाँ अभी स्कूली सुविधा नहीं है, वहाँ नये स्कूल खोलना और विद्यमान स्कूलों में अतिरिक्त क्लास रूम अध्ययन कक्ष, शौचालय, पीने का पानी, मरम्मत निधि, स्कूल सुधार निधि प्रदान कर उसे सशक्त बनाये जाने की भी योजना है। वर्तमान में कार्यरत वैसे स्कूल जहाँ शिक्षकों की संख्या अपर्याप्त है वहाँ अतिरिक्त शिक्षकों की व्यवस्था की जाएगी जबकि वर्तमान में कार्यरत शिक्षकों को गहन प्रशिक्षण प्रदान कर, शिक्षण-प्रवीणता सामग्री के विकास के लिए निधि प्रदान कर एवं टोला, प्रखंड, जिला स्तर पर अकादमिक सहायता संरचना को मजबूत किया जाएगा। सर्व शिक्षा अभियान जीवन-कौशल के साथ गुणवत्तायुक्त प्रारंभिक शिक्षा प्रदान करने की इच्छा रखता है। सर्व शिक्षा अभियान का बालिका शिक्षा और जरूरतमंद बच्चों पर खास जोर है। साथ ही, सर्व शिक्षा अभियान का देश में व्याप्त डिजिटल दूरी को समाप्त करने के लिए कंप्यूटर शिक्षा प्रदान करने की भी योजना है।
सर्व शिक्षा अभियान का उद्देश्य
सभी बच्चों के लिए वर्ष 2005 तक प्रारंभिक विद्यालय, शिक्षा गारंटी केन्द्र, वैकल्पिक विद्यालय, "बैक टू स्कूल" शिविर की उपलब्धता।
सभी बच्चे 2007 तक 5 वर्ष की प्राथमिक शिक्षा पूरी कर लें।
सभी बच्चे 2010 तक 8 वर्षों की स्कूली शिक्षा पूरी कर लें।
संतोषजनक कोटि की प्रारंभिक शिक्षा, जिसमें जीवनोपयोगी शिक्षा को विशेष महत्त्व दिया गया हो, पर बल देना।
स्त्री-पुरुष असमानता तथा सामाजिक वर्ग-भेद को 2007 तक प्राथमिक स्तर तथा 2010 तक प्रारंभिक स्तर पर समाप्त करना।
वर्ष 2010 तक सभी बच्चों को विद्यालय में बनाए रखना।
संभाग स्तर
संभागायुक्त ने कार्ययोजना पर विस्तार से चर्चा करते हुए कहा कि अकादमिक कार्ययोजना का दृढ़तापूर्वक पालन सुनिश्चित करें। उन्होंने प्रयोगशाला संवर्धन योजना की समीक्षा करते हुए कहा कि प्रत्येक शासकीय हाईस्कूल तथा हायर सेकेण्ड्री स्कूल में प्रायोगिक कार्यों के लिए संसाधन, यंत्र तथा अन्य आवश्यकताओं का आंकलन कर इनकी पूर्ति शाला स्तर पर अथवा अन्य स्तर से किये जाने की संभावनाएं तलाशें। शालाओं का लिकेंज रेडियेंट शालाओं से करते हुए एनजीओ तथा रीजनल साइंस सेन्टर के सहयोग से मॉडल प्रयोगशालाओं तथा प्रत्येक जिले में एक चलित प्रयोगशाला का निर्माण सुनिश्चित करें ताकि बच्चें सैद्धांतिक ज्ञान के साथ साथ प्रायोगिक ज्ञान भी प्राप्त कर सकें। संभागायुक्त ने कहा कि शालाओं की मॉनिटरिंग शाला दर्पण व्यवस्था के अनुरूप करें। संभाग स्तर से संयुक्त संचालक, उप संचालक तथा सहायक संचालक, जिला स्तर पर जिला शिक्षा अधिकारी, सहायक संचालक, एडीपीसी, ज्ञानपुंज दल, डीपीसी तथा एपीसीस्याज, विकासखंड स्तर पर बीईओ, बीआरसी तथा बीएसीज, संकुल स्तर पर प्राचार्य तथा क्लस्टर स्तर पर सीआरसी प्रथम चरण में समस्त 50 प्रतिशत से कम परीक्षा परिणाम वाली प्राथमिक, माध्यमिक, हाईस्कूल तथा हायर सेकेण्डरी शालाओं की माह अप्रैल एवं जुलाई 2019 में मॉनीटरिंग सुनिश्चित करें। संभागायुक्त कल्पना श्रीवास्तव ने निर्देशित किया कि मॉनिटरिंग के दौरान मुख्यत: शिक्षकों तथा विद्यार्थियों की नियमित उपस्थिति, कक्षाओं का व्यवस्थित संचालन, प्रायोगिक कार्य का संचालन, ब्रिज कोर्स संचालन, शिक्षकों का ओरिएन्टेशन एवं शिक्षक डायरी का सही लेखा एवं संधारण, पुस्तकों का वितरण तथा शिक्षक हैंडबुक एवं वर्क बुक का उपयोग, शौचालय की स्वच्छता, स्वच्छ पेयजल की व्यवस्था, स्वच्छता पखवाड़ा एवं जागरूकता आयोजन, शाला परिसर में वृक्षारोपण की तैयारी तथा शाला स्वच्छता एवं पर्यावरण ग्रुप का गठन कराना सुनिश्चित करें।
उन्होंने कहा कि जिन शालाओं में शिक्षकों की कमी है उन्हें चिन्हित कर विद्यादान कार्यक्रम संचालित करना सुनिश्चित करें। स्वयं सेवकों के रजिस्ट्रेशन के लिये वेबसाइट, शालाओं द्वारा कालेज/ यूनिवर्सिटी तथ प्रोफेशनल्स से चर्चा कर स्वयं सेवक तैयार करना तथा उनके द्वारा उपयुक्त दिनांकों एवं समय पर चयनित विषयों के अध्यापन के प्रस्ताव प्राप्त कर उनका ओरिएन्टेशन कराना तथा शिक्षण सामग्री उपलब्ध कराकर अध्यापन प्रारंभ कराना सुनिश्चित करें। संभाग में बंद पड़ी खदानों को जल संरचनाओं के रूप में विकसित किया जाए भोपाल संभाग में बंद पड़ी खदानों को जल संरचनाओं के रूप में विकसित किया जायेगा। इस संबंध में सोमवार को संभागायुक्त कल्पना श्रीवास्तव ने संभाग के सभी मुख्य कार्यपालन अधिकारियों को पत्र लिखकर निर्देश दिये हैं कि संभाग के सभी जिलों में कईं ऐसी खदानें हैं
Q2

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स्वास्थ्य शिक्षा

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बिहार सरकार ने बाल कन्या विवाह रोकने के लिए प्रमुख पहल के रूप में मुख्यमंत्री कन्या उत्थान योजना की शुरुवात की है। इस योजना के अंतर्गत, राज्य सरकार एक बालिका...

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शुभदा मानसिक रूप से विमंदित लोगों के लिए कार्यरत एक गैर सरकारी संस्था है। इस संस्था का मुख्यालय भारत देश के राजस्थान प्रदेश के अजमेर शहर में है। फिलहाल इसका ...

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प्रमाणित वित्तीय नियोजक (सर्टिफाइड फाइनेंशियल प्लानर)

प्रमाणित वित्तीय नियोजक पद, वित्तीय नियोजकों के लिए एक पेशेवर प्रमाणपत्र है जिसे संयुक्त राज्य अमेरिका में सर्टिफाइड फाइनेंशियल प्लानर बोर्ड ऑफ स्टेंडर्ड्स इ...

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शशांक कुमार द्विवेदी

परिचय अंगूठाकार|Shashank Dwivedi शशांक कुमार द्विवेदी, वर्तमान में मेवाड़ विश्वविद्यालय, चितौड़गढ में उपनिदेशक के पद पर कार्यरत हैं। साथ ही प्रतिष्ठित पत्रिक...

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