ⓘ मुक्त ज्ञानकोश. क्या आप जानते हैं? पृष्ठ 276

बाजीकरण

बाजीकरण, आयुर्वेद के आठ अंगों में से एक अंग है। इसके अन्तर्गत शुक्रधातु की उत्पत्ति, पुष्टता एवं उसमें उत्पन्न दोषों एवं उसके क्षय, वृद्धि आदि कारणों से उत्पन्न लक्षणों की चिकित्सा आदि विषयों के साथ उत्तम स्वस्थ संतोनोत्पत्ति संबंधी ज्ञान का वर्ण ...

बोवर पाण्डुलिपि

बोवर पाण्डुलिपि गुप्तकाल की पाण्डुलिपि है। यह ब्राह्मी लिपि तथा मिश्रित बौद्ध संस्कृत में लिखी गयी है। यह आयुर्वेद से सम्बन्धित है। यह ऑक्सफोर्ड के बोदलियन पुस्तकालय में रखी हुई है।

भाव प्रकाश

भावप्रकाश आयुर्वेद का एक मूल ग्रन्थ है। इसके रचयिता आचार्य भाव मिश्र थे। भावप्रकाश में आयुवैदिक औषधियों में प्रयुक्त वनस्पतियों एवं जड़ी-बूटियों का वर्णन है। भावप्रकाश, माधवनिदान तथा शार्ङ्गधरसंहिता को संयुक्त रूप से लघुत्रयी कहा जाता है। भावप्रक ...

भेलसंहिता

भेलसंहिता संस्कृत में रचित आयुर्वेद का ग्रन्थ है। इसके रचयिता भेलाचार्य हैं जो अत्रेय के छः शिष्यों में से एक थे। अग्निवेश भी अत्रेय के ही शिष्य थे। भेलसंहिता कई शताब्दियों तक अप्राप्य हो गई थी किन्तु १८८० में ताड़पत्पर लिपिबद्ध एक प्रति प्राप्त ...

भैषज्य कल्पना

आयुर्वेद में भैषज्य कल्पना का अर्थ है औषधि के निर्माण की डिजाइन । आयुर्वेद में रसशास्त्र का अर्थ औषध निर्माण है और यह मुख्यतः खनिज मूल के औषधियों से सम्बन्धित है।रसशास्त्और भैषज्य कल्पना मिलकर आयुर्वेद का महत्वपूर्ण अंग बनाते हैं। भैषज्यकल्पना कि ...

मदार

मदार एक औषधीय पादप है। इसको मंदार, आक, अर्क और अकौआ भी कहते हैं। इसका वृक्ष छोटा और छत्तादार होता है। पत्ते बरगद के पत्तों समान मोटे होते हैं। हरे सफेदी लिये पत्ते पकने पर पीले रंग के हो जाते हैं। इसका फूल सफेद छोटा छत्तादार होता है। फूल पर रंगीन ...

माधव निदान

माधवनिदानम् आयुर्वेद का प्रसिद्ध प्राचीन ग्रन्थ है। इसका मूल नाम रोगविनिश्चय है। यह माधवकर द्वारा प्रणीत है जो आचार्य इन्दुकर के पुत्र थे और ७वीं शताब्दी में पैदा हुए थे। माधव ने वाग्भट के वचनों का उल्लेख किया है। विद्धानों ने माधवकर को बंगाली हो ...

रंजक पित्‍त

यह पित्‍त रंगनें का कार्य करता है। रक्‍त की लाली, त्‍वचा का रंग, आंखों की पुतलियों का रंग रंगनें का कार्य करनें से इसे रंजक पित्‍त कहते हैं। यह यकृत और प्‍लीहा में रहकर रक्‍त का र्निमाण करता है।

रक्‍त धातु

आयुर्वेद में रक्त कोशिकाओं एवं इनके परिसंचरण का नाम रक्त धातु है। चरकसंहिता के अनुसार रक्त धातु की कमी होने पर शरीर की त्वचा मोटी, फटी हुई एवं कांतिहीन हो जाती है।

रस (वनस्पति)

रस फल या सब्जी के ऊतकों में निहित एक प्राकृतिक तरल है। रस को ताजे फल या सब्जियों से उष्मा या विलायक सॉल्वैंट का प्रयोग किए बिना, या तो याँत्रिक विधि से निचोड़ कर या फिर सिझा कर निकाला जाता है। उदाहरण के लिए, संतरे का रस, संतरे के फल को दबा कर या ...

रसतरंगिणी

रसतरंगिणी, रसशास्त्र का एक ग्रन्थ है जिसकी रचना महामहोपाध्‍याय सदानन्द शर्मा नें लगभग 200 वर्ष पूर्व की है। इस ग्रंथ के ग्रंथकार नें कुछ द्रव्‍यों का औषधीय प्रयोग बतलाया है जो अन्‍यत्र नहीं मिलते हैं।

रसरत्नसमुच्चय

रसरत्नसमुच्चय रस चिकित्सा का सर्वांगपूर्ण ग्रन्थ है। इसमें रसों के उत्तम उपयोग तथा पारद-लोह के अनेक संस्कारों का उत्तम वर्णन है। यह वाग्भट की रचना है। रसशास्त्र के मौलिक रसग्रन्थों में रसरत्नसमुच्चय का स्थान सर्वोच्च है। इसमें पाये जाने वाले स्वर ...

राष्ट्रीय भारतीय आयुर्विज्ञान संपदा संस्थान

राष्ट्रीय भारतीय आयुर्विज्ञान संपदा संस्थान भारत का एक संस्थान है जो आयुर्वेद, योग, यूनानी, सिद्ध, होमियोपैथी, सोवा रिग्पा एवं आधुनिक चिकित्सा के ऐतिहासिक दृष्टि से अध्ययन एवं प्रलेखन में रुचि रखने वाले इतिहासकारों, वैज्ञानिकों एवं अन्य लोगों के ...

अपान वात

यह वायु पक्‍वाशय में रहती है तथा इसका कार्य मल, मूत्र, शुक्र, गर्भ और आर्तव को बाहर निकालना है। जब यह कुपित होती है तब मूत्राशय और गुदा से संबंधित रोग होते हैं।

विरेचन

विरेचन भारतीय चिकित्साशास्त्र का पारिभाषिक शब्द है। इसका अर्थ है-रेचक औषधि के द्वारा शारीरिक विकारों अर्थात् उदर के विकारों की शुद्धि। यह पंचकर्मों में से एक है। आयुर्वेद के अनुसार त्वचारोगों के उपचार के लिए विरेचन सर्वोत्तम चिकित्सा है।

विश्व आयुर्वेद परिषद

विश्व आयुर्वेद परिषद की स्थापना १९७७ में हुई थी। इसका लक्ष्य आयुर्वेद को पुनः प्रतिष्ठित करना है। यह विश्व आयुर्वेद जर्नल नामक एक पत्रिका भी प्रकाशित करता है।

विश्वनाथ चिकित्सा

विश्वनाथ चिकित्सा, सन १९२१ में रचित एक चिकित्सा ग्रन्थ है जिसके रचयिता पश्चिम बंगाल निवासी विश्वनाथ सेन थे। इसमें उनके समय के प्रसिद्ध एवं लोकप्रिय आयुर्वेदिक औषधियों का वर्णन है।

वृहत्त्रयी

वृहत्त्रयी से तात्पर्य आयुर्वेद के तीन महान ग्रंथों के समूह से है। ये तीन ग्रंथ हैं- अष्टांगहृदयम वाग्भटकृत सुश्रुतसंहिता चरकसंहिता किन्तु संस्कृत काव्य में बृहत्त्रयी से तात्पर्य किरातर्जुनीयं,शिशुपालवधं एवं नैषधचरितं से है और आज के समय मे यही अ ...

वैद्य

आयुर्वेद या अन्य पारम्परिक चिकित्साप्रणाली का अभ्यास करने वाले चिकित्सकों को वैद्य या वैद्यराज कहते हैं। वैद्य का शाब्दिक अर्थ है, विद्या से युक्त। आधुनिक डॉक्टर इसका पर्याय है। अधिक अनुभवी वैद्यों को वैद्यराज कहते हैं। भारतीय उपमहाद्वीप के अपने ...

वैद्यचिन्तामणि

वैद्यचिन्तामणि एक आयुर्वेद ग्रन्थ है जिसके रचयिता आचार्य वल्लभाचार्य थे। ये आन्ध्र प्रदेश के निवासी थे और यह ग्रन्थ संस्कृत तथा तेलुगु में है तथा इसकी लिपि तेलुगु है। २००४ से इसका हिन्दी अनुवाद भी उपलब्ध है। इस ग्रन्थ की रचना १५वीं शताब्दी में हु ...

व्‍यान वात

यह वायु समस्‍त शरीर में धूमती है। इसी वायु के प्रभाव से रस, रक्‍त तथा अन्‍य जीवनोपयोगी तत्‍व सारे शरीर में बहते रहते हैं। शरीर के समस्‍त कार्यकलाप और कार्य करनें की चेष्‍टायें बिना व्‍यान वायु के सम्‍पन्‍न नहीं हो सकती हैं। जब यह कुपित होती है तो ...

शंखद्राव

शंखद्राव आयुर्वेद की औषधि है। चूंकि इस दृव अवस्‍था वाली औषधि में शंख, कौड़ी, प्रवाल और मुक्‍ता जैसे द्रव्‍यों को मिला देंनें से उक्‍त द्रव्‍य गल जातें हैं, इस कारण इसे शखद्राव कहते हैं।

शल्यतन्त्र

शल्यतन्त्र, आयुर्वेद के आठ अंगों में से एक अंग है। सुश्रुत को शल्यक्रिया का जनक माना जाता है। वाग्भट द्वारा रचित अष्टाङ्गहृदयम् का २९वाँ अध्याय शस्त्रकर्म विधि है। महर्षि सुश्रुत प्रथम व्यक्ति है जिन्होंने शल्यतंत्र के वैचारिक आधारभूत सिद्धान्तों ...

शार्ङ्गधर

शार्ङ्गधर मध्यकाल के एक आयुर्वेदाचार्य थे जिन्होने शार्ङ्गधरसंहिता नामक आयुर्वैदिक ग्रन्थ की रचना की। शार्ङ्गधर का जन्म समय १३वीं-१४वीं सदी के आसपास माना गया है। शार्ङ्गधरसंहिता में ग्रन्थकार ने कुछ ही जगह अपने नामों का उल्लेख किया है। इनके पिता ...

शार्ङ्गधरसंहिता

सार्ङगधरसंहिता, आयुर्वेद का प्रसिद्ध ग्रन्थ है। इसके रचयिता शार्ङ्गधर हैं। इसकी रचना १२वीं शताब्दी में हुई थी। इसमें तीन खण्ड हैं - प्रथम खण्ड, मध्यम खण्ड तथा उत्तर खण्ड। श्री शार्ंगधराचार्य ने इस ग्रन्थ की विषयवस्तु को प्राचीन आर्ष ग्रन्थों से स ...

शिरोधारा

शिरोधारा, एक प्रकार का आयुर्वेदिक उपचार है जिसमें ललाट पर धीरे-धीरे किसी द्रव की धार गिरायी जाती है। कौन सा द्रव प्रयुक्त होगा, यह इस बात पर निर्भर करता है कि किस रोग का उपचार किया जा रहा है। मुख्यतः कोई तेल, दूध, छाछ, नारियल का पानी, या साधारण ज ...

शिलाजीत

शिलाजीत एक गाढ़ा भूरे रंग का, चिपचिपा पदार्थ है जो मुख्य रूप से हिमालय की चट्टानों में पाया जाता है। इसका रंग सफेद से लेकर गाढ़ा भूरा के बीच कुछ भी हो सकता है शिलाजीत का उपयोग आमतौपर आयुर्वेदिक चिकित्सा में किया जाता है। आयुर्वेद ने शिलाजीत की बह ...

शोधन

रसविद्या के सन्दर्भ में, शोधन उस प्रक्रिया का नाम है जो औषधिनिर्माण के समय कच्चे पदार्थों के निराविषन, शुद्धीकरण, या प्रभावीकरण के लिये उपयोग में लाये जाते हैं।

श्‍लेष्‍मन कफ

यह कफ सन्धियों में रहता है और इन स्‍थानों को कफ विहीन नहीं करता है। रसन कफ: यह कन्‍ठ में रहता है और रस को गृहण करता है। कड़वे और चरपरे रसों का ज्ञान इसी से होता है।

काश्यप संहिता

काश्यपसंहिता कौमारभृत्य का आर्ष व आद्य ग्रन्थ है। इसे वृद्धजीवकीयतन्त्र भी कहा जाता है। महर्षि कश्यप ने कौमारभृत्य को आयुर्वेद के आठ अंगों में प्रथम स्थान दिया है। इसकी रचना ईसापूर्व ६ठी शताब्दी में हुई थी। मध्ययुग में इसका चीनी भाषा में अनुवाद ह ...

सात्विक आहार

वह आहार जिसमें सत्व गुण की प्रधानता हो, सात्विक आहार कहलाता है। योग एवं आयुर्वेद कहा गया है कि सात्विक आहार के सेवन से मनुष्य का जीवन सात्विक बनता है। यौगिक और सात्विक आहार की श्रेणी में ऐसे भोजन को शामिल किया जाता है जो व्यक्ति के तन और मन को शु ...

साधक पित्‍त

== साधक पित्‍त: == शरीर में सबसे महत्वपूर्ण स्थान हृदय में साधक पित्त का स्थान है जो पित्त ह्रदय में स्थित रहता है उसकी साधकाग्नि संज्ञा है।। वह इच्छित मनोरथो का साधन करने वाला होता है आचार्य डलहण ने इसका स्पष्टीकरण करते हुए लिखा है- हृदय में जो ...

स्वस्थवृत्त

आयुर्वेद में, स्वस्थवृत्त के अन्तर्गत देश, काल, ऋतु और प्रकृति के अनुरूप आहार-विहार का वर्णन किया गया है। स्वस्थ मनुष्य के स्वास्थ्य की रक्षा करना तथा देश, काल, ऋतु प्रकृति के अनुसार उसके सम्यक् आहार-विहार का उपदेश करना स्वस्थवृत्त का प्रयोजन है। ...

स्वेदन

स्वेदन का तात्पर्य उस प्रक्रिया से है जिससे स्वेद अर्थात पसीना उत्पन्न हो। कृत्रिम उपायों द्वारा शरीर में स्वेद उत्पन्न करने की क्रिया स्वेदन कहलाती है। स्वेदन के भेद- १ एकांग स्वेद- अंग विशेष का स्वेदन २ सर्वांग स्वेद- संपूर्ण शरीर का स्वेदन अ अ ...

हल्दी

हल्दी भारतीय वनस्पति है। यह अदरक की प्रजाति का ५-६ फुट तक बढ़ने वाला पौधा है जिसमें जड़ की गाठों में हल्दी मिलती है। हल्दी को आयुर्वेद में प्राचीन काल से ही एक चमत्कारिक द्रव्य के रूप में मान्यता प्राप्त है। औषधि ग्रंथों में इसे हल्दी के अतिरिक्त ...

हारीत संहिता

हारीत संहिता, चिकित्साप्रधान आयुर्वेद ग्रन्थ है। इसकी सफल चिकित्सा विधि वैद्य एवं रुग्ण के लिए उपयुक्त है। इसके रचयिता महर्षि हारीत हैं, जो आत्रेय पुनर्वसु के शिष्य थे। आत्रेय पुनर्वसु के छः शिष्य थे और सभी शिष्यों ने अपने-अपने नाम से अपने-अपने त ...

अष्टाङ्गहृदयम्

अष्टाङ्गहृदयम्, आयुर्वेद का प्रसिद्ध ग्रंथ है। इसके रचयिताa वाग्भट हैं। इसका रचनाकाल ५०० ईसापूर्व से लेकर २५० ईसापूर्व तक अनुमानित है। इस ग्रन्थ में ग्रन्थ औषधि और शल्यचिकित्सा दोनो का समावेश है। चरकसंहिता, सुश्रुतसंहिता और अष्टाङ्गहृदयम् को सम्म ...

अक्ष सूक्त

अक्ष सूक्त ऋग्वेद का एक प्रसिद्ध सूक्त है। यह सूक्त ऋग्वेद के दशम मंडल में संकलित है और इस मंडल का 34वाँ सूक्त है। ऋषि कवष ऐलूष इसके द्रष्टा हैं और यह त्रिष्टुप् तथा जगती नामक वैदिक छंदों में निबद्ध है। सूक्त में जुआरी अपने बारे में, जुए कि निंदा ...

अनु लोग

अनु बृहत भारतीय उपमहाद्वीप के पश्चिमोत्तर भाग में बसने वाले आर्य समुदाय का एक प्रमुख क़बीला था। इनका वर्णन ऋग्वेद १:१०८:८ और ८:१०:५ में मिलता है और दोनों जगहों पर उनका उल्लेख द्रुह्यु समुदाय के साथ आता है। ऋग्वेद के सातवे मंडल में अनु योद्धा पुरु ...

शब्दकोश

अनुवाद
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